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Brahmacharyashram

संक्षिप्त परिचय
स्थान व इतिहास

दक्षिण भारत में श्री अतिशय क्षेत्र बाहुबली (कुंभोज) यह तीर्थस्थान शतकावधि से प्रसिद्ध है । यह स्थान कोल्हापूर जिले में तहसील हातकणंगला से उत्तरकी ओर ७ किलोमीटर दूरी पर है । यह तीर्थ प्राचीन काल से अनेक मुनिगणों की तपस्या भूमि रही है । पहाड पर वर्तमान में भी श्री १००८ भगवान बाहुबली का ६ फीट ऊँचा सातिशय कलापूर्ण अतिप्राचीन मनोज्ञ जिनबिम्ब तथा प्राचीन सहस्रकूट जिनबिम्ब आदि विराजमान हैं । भ. बाहुबलि मूर्तिपर शक संवत्सर १०७८ ( इ.स.११५६) में वैशाख शुद्ध १० तिथि को श्री १०८ श्रुतसागर मुनिराज की प्रेरणा से यह बिम्ब स्थपित होने का उल्लेख बम्बई अहाता (दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र-डिरेक्टरी) में मिलता है । करीब साडे तीन सौ साल पूर्व नान्द्रे (जि. सांगली) गाँव के पूज्यवर मुनिश्री १०८ बाहबली महाराज यहाँ तपस्या एवं ध्यान करते थे, और उन्हें मंत्रविद्या भी सिद्ध थी, जिससे हिंस्र श्वापदों द्वारा उन्हें या दर्शनार्थी को कुछ भी उपद्रव नहीं होता था । इन्हीं कारणों से यह तीर्थस्थान ‘श्री अतिशय क्षेत्र बाहुबली’ नाम से अधिक विश्रुत हुआ प्रतीत होता है।
क्षेत्र पर पूज्य बाहुबली मुनिराज के चरणचिन्ह स्थापित हैं और अन्य दो जिनालय, मनोज्ञ मानस्तम्भ एवं धर्मशाला, आश्रमनिवास आदि कतिपय भवन विद्यमान हैं । सन १९८४ में प. पू. आचार्य विद्यानंद मुनिराज की प्रेरणा से प्राचीन जिनालयों का जीर्णोद्धार हुआ, और उनके सामने नए विशाल रत्नत्रय (त्रिकूट) मन्दिर का नवनिर्माण भी हुआ है, जिसकी नींव सन १९१४ में जैन समाज के द्रष्टा महापुरुष नांदणीनिवासी श्रावकोत्तम स्व. श्री. कल्लाप्पा भरमाप्पा निटवे द्वारा डाली गई थी।
मुनिश्री बाहुबली महाराजजी के पश्चात् सन १८५१ में मुनिश्री प्रभाचन्द्रजी, १८५८ में मुनिश्री कमलाकरजी तथा बीसवी शताब्दि में महातपस्वी मुनिराज सिद्धसागरजी, प. पू. चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागरजी, उनके शिष्य प. पू. मुनिश्री आदिसागरजी पायसागरजी, श्री वर्धमानसागरजी, श्री वीरसागरजी, श्री नेमिसागरजी आदि अनेक मुनिराजों ने अपनी आत्मसाधना एवं ध्यान-तपस्या से इस भूमि को पावन किया है । सन १९२७ में पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराजजी का चातुर्मासिक वास्तव्य तथा पहली तीर्थराज सम्मेदशिखरजी-महायात्रा का शुभारम्भ यहीं से हुआ है, यह विदित करते हुए प्रसन्नता होती है । इस दृष्टि से यह सातिशय पुण्यक्षेत्र सदियों से अनेक दिगम्बर महामुनिराजों की विहार-भूमि एवं तपोभूमि रही है, यह स्पष्ट है।

ब्रह्मचर्याश्रम संस्था स्थापना
दक्षिण भारत में गुरुकुल शिक्षाप्रणाली का प्रारम्भ करने के उद्देश से आषाढ शुद्ध २, दि. १३ जुलै १९३४ के शुभदिन केवल पाँच विद्यार्थियों को लेकर, परम पूज्य गुरुदेव १०८ श्री समंतभद्र महाराजजीने ( उस समय के क्षुल्लक पदधारी) इस शुभस्थान में श्री बाहुबली ब्रह्मचर्याश्रम’ इस संस्था का शुभारम्भ किया । प्रारम्भ में यहाँ पहाड पर स्व. श्री. कल्लाप्पा भरमाप्पा निटवे ने समाज की सहाय्यता से जो भव्य वास्तु निर्मित की हैं एवं तलहटी में एक मुनिगुंफा थी उसीके पास पर्णकुटी बांधकर आश्रम का कार्य शुरू किया गया । अध्ययन की कक्षाएँ प्राय: पेड के नीचेही चलती थी।

संस्थापक
इस संस्था के संस्थापक बालब्रह्मचारी परमपूज्य १०८ श्री समन्तभद्र महाराज उस समय क्षुल्लक-पदस्थ थे । परमपूज्य प्रात:स्मरणीय आचार्यश्री १०८ शांतिसागरजी महाराज के करकमलों द्वारा उन्होंने सन १९३२ में ब्यावर में क्षुल्लक’ पदकी दीक्षा ली थी। उसके बाद सन १९५२ में. प. पू. आचार्यश्री के ज्येष्ठ भ्राता प. पू. १०८ श्री वर्धमानसागर महाराजजीके करकमलोंसे उन्होंने जैनेश्वरी भगवती दिगम्बर दीक्षा ग्रहण कर अपना इहजन्म सार्थक किया। इसके पहले सन १९१८ से कारंजा में आपने श्री महावीर ब्रह्मचर्याश्रम की स्थापना की थी, और वहाँ के प्राप्त अनुभव के बलपर यहाँ कार्य प्रारम्भ किया।
आप मूलतः दुधनी (जि. सोलापूर) निवासी थे । सोलापूर, बडौदा तथा बम्बई में रहकर बम्बई विश्वविद्यालय से बी. ए. (संस्कृत, अंग्रेजी) तक शिक्षा प्राप्त की । शुरूसे अध्यात्म में नैसर्गिक रुचि एवं समाज तथा देशसेवा में आस्था थी । बाल्य काल में ही मित्र मोतीचन्द के साथ बार्शी से सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी तक पैदल यात्रा करते हुए वहाँ पहुँचने पर दोनोंने आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करने का दृढ संकल्प किया था । बालकों को योग्य संस्कारपूर्वक शिक्षा देकर उनका शीलसंवर्धन (Character-Building) करने में ही सच्ची समाज तथा देश की सेवा है, यह आपकी आन्तरिक श्रद्धा थी। और उसीका यह मधुर फल है कि, आपके द्वारा यहाँ प्राचीन गुरुकुल शिक्षापद्धति के साथ अर्वाचीन जीवनोपयोगी शिक्षा का सुंदर समन्वय करके बालकों का जीवन सभी दृष्टि से समर्थ एवं समुन्नत बने इस दिशा से बुनियादी कार्य शुरू है । इस कार्य में शुरू से धर्मशील पूज्य १०५ पार्श्वमती माताजी, शिक्षाप्रेमी उदारधी श्रावक-श्राविकागण एवं कीर्तनकार श्री. जिनगोंडा पाटील, ब्र. जिनदासजी, श्री. ए. बी. पाटील, नेजकर, श्रीमती गजाबेनजी शहा, बा. ब्र. माणिकचंदजी चवरे, बा. ब्र. माणिकचंदजी भीसीकर, बा. ब्र. वालचंद शहा, बा. ब्र. माणिकचंदजी शहा, मोहोळकर, बा. ब्र. मृत्युंजयजी मालगावे, बा. ब्र. भूपालजी दलाल, बा. ब्र. अजितकुमारजी करके आदि कतिपय निःस्वार्थ सेवाभावी कार्यकर्ताओं का स्मरणीय सहयोग रहा है।

ध्येय एवं गुरुकुल-पंचसूत्री
‘शील, ज्ञान, प्रेम, सेवा और व्यवस्था’ यह गुरुकुल-प्रणाली की पंचसूत्री रही है । इसी आधार पर विद्यार्थीजीवन सुसंस्कृत बनाना और वे समाज एवं देश के समर्थ एवं संतुलित घटक बने यही संस्था का ध्येय है । उसके अनुसार विद्यार्थियों के शरीर, बुद्धि तथा मन (Hand, Head and Heart) का संतुलित विकास करने का समुचित प्रयत्न संस्था में किया जाता है। शरीरसंगठन एवं धर्मशिक्षा के साथ स्वावलंबन तथा सहजीवन के प्रात्यक्षिक पाठ उन्हें मिलते हैं । अपना और संस्था का कोई भी कार्य वे खुद्द उत्साहपूर्वक करते हैं । गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा यह भेद न करते हुए सभी विद्यार्थी समान भाव से और सादगी से रहते हैं ।

शिक्षा प्रबंध
संस्था में कला, तन्त्र और वाणिज्य तीनों शाखाओं द्वारा शालान्त तथा उच्च माध्यमिक प्रमाणपत्र परीक्षा तक अध्ययन का समुचित प्रबंध है । गुरुकुल पद्धति से बहुउद्देशीय शिक्षण देनेवाली कोल्हापूर-सांगली जिलों के ग्रामीण भागों में यह एकही संस्था है । वर्तमान में शिशुवर्ग से १२ वी तक कुल १८०० छात्र-छात्राएँ पढती हैं । बाहुबली तथा कर्नाटक शाखाओंके गुरुकुलों में ३५३० छात्र प्रेम एवं बंधु-भाव से रहते हैं । इससे उन्हें राष्ट्रीय एकात्म भावना का सहज पाठ मिलता है । सन १९९७ से डेअरी टेक्नॉलॉजी, हॉर्टिकल्चर और घरेलू विद्युत उपकरणों की दुरुस्ती विभाग का व्यावसायिक शिक्षा विभाग शुरू हैं । तथा सन २००२ से उच्च माध्यमिक स्तरीय कला, विज्ञान एवं वाणिज्य इन तीन शाखाओं का शुभारंभ हुआ है । बालविकास एवं प्राथमिक विद्यामंदिर की शुरुवात सन २००३ में हुई है।

 पावन वंदनीय तीर्थधाम विगत पचास वर्षों से इस गुरुकुल संस्था का बहुमुखी विकास हुआ है। परम पूज्य स्व. चारित्रचक्रवर्ती १०८ आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज के उपदेशानुसार सन १९६३ में भगवान बाहुबली की २८ फीट की मनोज्ञ महामूर्ति पंचकल्याण महोत्सवपूर्वक विराजमान की गई है । तथा १९७० में और सन १९८३ में भारत के कतिपय सुप्रसिद्ध दिगंबर सिद्धक्षेत्रों की मनोहारी रचनाएँ तैयार की गई हैं। मारकर इस के साथही श्री महावीर समवसरण जिनमन्दिर, स्वयम्भू मन्दिर, रत्नत्रय जिनमन्दिर, नन्दीश्वर-पंचमेरू की सुन्दर रचना, मानस्तम्भ, कीर्तिस्तम्भ आदि कई दर्शनीय एवं वंदनीय स्थानों का निर्माण हुआ है, जिनसे यह एक पावन तथा पुण्यवर्धक तीर्थधाम बन गया है । इस पवित्र रमणीय वातावरण से छात्रों के चारित्रसंगठन में महती मदद होती है। सर्व मन्दिरों की एवं तीर्थधामों की दैनिक पूजाभक्ति छात्र प्रात: निरागस प्रसन्न भावना से करते हैं, जो दृश्य अतीव सुहावना तथा प्रेरणादायी प्रतीत होता है। की ऐसे पवित्र वातावरण में सहस्रावधि छात्रों का जीवन सदाचारयुक्त मंगल संस्कार से निरंतर फूलता-फलता देखकर किसका हृदय आनंदातिशय से पुलकित नहीं होगा? आचार्य अमितगति ने ‘धर्मपरीक्षा’ में कहा है

दृश्यन्ते परितच्छात्रा: सञ्चरन्तो विशारदाः।
गृहीत-पुस्तका यत्र भारती-तनया इव ॥३-२४।।।

जहाँ चारों ओर सरस्वती-पुत्रसमान हाथों में पुस्तक लिए अति चतुर छात्र यत्र तत्र संचार करते दिखाई देते हैं-ऐसा यह बाहुबली विद्यापीठ लौकिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान का केन्द्र बनता जा रहा है । वह इसी प्रकार वर्धिष्णु रहे यही प. पू. गुरुदेव की आन्ततिक भावना रही है।

अन्य जीवनोपयोगी कला-शिक्षा

छात्रों के शील तथा शरीरसंवर्धन, मनोविकास तथा कला-विकास के लिए संस्था विशेष प्रयत्न कर रही है । प्रार्थना, पूजा-भक्ति, सामायिक पाठ, कथाकथन आदि नित्यक्रियाओं द्वारा छात्रों पर धर्म एवं नीति के अच्छे संस्कार किये जाते हैं । साथ ही चित्रकला, कॉम्प्युटर आदि जीवनोपयोगी कलाओं का भी परिज्ञान अन्य समय में विद्यार्थी प्राप्त करते हैं। 

स्वावलंबन और सेवाएँ 
गुरुकुल में रहनेवाले सभी छात्र अपना अपना काम प्रायः स्वावलंबन से करते हैं। यहाँ का अध्ययन होने के पश्चात् यहीं रहकर निःस्वार्थ सेवा देते हुए बी. ए., बी. एड्., एम्. ए. तक उच्च अध्ययन करते है
और बाहर से विद्यापीठ की परीक्षाओं में शामिल होकर उनमें अच्छी सफलता प्राप्त करते हैं । ग्रंथालय, वाचनालय, बचत संचयिका, पुस्तक पेढी, सहकार वस्तू-भांडार आदि विविध कार्यों में अध्यापकों का मार्गदर्शन लेते हुए अच्छी दिलचस्पी दिखाते हैं। इन सभी गतविधियों से उनका जीवन स्वावलंबी, कार्यक्षम एवं समुन्नत बनने में विशेष प्रेरणा मिलती है। वार्षिक खर्च तथा सहाय्यता के मार्ग संस्था के श्री मोतीचन्द गौतमचन्द शहा विद्यामंदिर, उच्च माध्यमिक विभाग, श्री कस्तुरबाई वालचंद टेक्निकल इन्स्टिट्यूट विभाग ‘बाहुबली विद्यापीठ’ की ओर से संचलित हैं, जिनका वार्षिक व्यय अध्यापकोंके वेतन के अलावा करीब ५० लक्ष रु. तक होता है। और आश्रम, जिनमंदिर, विद्यार्थी वसतिगृह, सन्मति मासिक, ग्रंथ भंडार, खेती आदि विभाग ‘श्री बाहुबली ब्रह्मचर्याश्रम’ की ओर से चलते हैं, जिनके लिए करीब रु. ८० लक्ष का व्यय होता है। प्रत्येक छात्र से भोजन तथा व्यवस्था आदि मिलकर प्रति माह करीब १५०० रुपये खर्चा आता है, जिनमें से १/३ रक्कम पालकों से मिलती है। शेष सभी खर्चा धान्य संकलन, आहारदान, विद्यादान, शिष्यवृत्ति, ध्रुवकोष का ब्याज आदि में से होता है । बुद्धिमान एवं प्रयत्नशील असमर्थ छात्रों को संस्था प्रति वर्ष करीब ६ लक्ष रुपयों की शिष्यवृत्ति वितरण करती है । उदारचेता महानुभावों की आत्मीयतापूर्ण सहाय्यता से यह सब बन पाता है।

अन्य उल्लेखनीय कार्य

१) संस्था में शिशुवर्ग से १२ वी तक की कक्षाए शुरु हैं ।
२) ग्रंथालय में करीब १८ हजार पुस्तकें तथा वाचनीय वृत्तपत्र, मासिक आदि. की व्यवस्था है ।
३) सन्मति’ नामक मासिक-पत्रिका मराठी भाषा में संस्था – से प्रकाशित होती है, जिसमें ख्यातनाम विद्वानों द्वारा जैन संस्कृति, तत्त्वज्ञान, इतिहास, साहित्य आदि विषयों पर सुगम एवं बोधप्रद लेख दिये जाते हैं ।
४) विद्यालय और शाखाओं की तरफ से वार्षिक ‘वीरवाणी’ हस्तलिखित भी छात्रोंद्वारा निकालते हैं ।
५) इसके सिवा विविध कलाविकास के लिए वाङ्मय मंडल, नाट्य मंडल, संगीतिका, टिपरी खेल, नृत्यपथक आदि द्वारा छात्रों के समय-समयपर कार्यक्रम होते हैं।

‘अनेकान्त शोधपीठ की स्थापना’
सन १९८३ में परम पूज्य १०८ आचार्यश्री विद्यानंद मुनिराजजी के पावन सान्निध्य में यहाँ ‘गुरुकुल दिव्यावदान समारोह’ अभूतपूर्व धर्मोल्लास के साथ मनाया गया । समाज के अनेक मनीषी विद्वान, धीमान तथा श्रीमान इस समय पधारे थे । इस ऐतिहासिक नेत्रदीपक समारोह के अन्तिम दिन संस्था की ओर से अनेकान्त शोधपीठ’ की स्थापना हुई, जिसका सभी महानुभावों ने अपूर्व उल्लाससे स्वागत किया। ___

श्री बाहुबली ब्रह्मचर्याश्रम व विद्यापीठ
शाखाविस्तार गुरुकुल संस्था
१) श्री बाहुबली ब्रह्मचर्याश्रम, बाहुबली (जि. कोल्हापुर) १९३४
२) श्री पार्श्वनाथ बह्मचर्याश्रम, स्तवनिधी (जि. कोल्हापुर) १९३९
३) श्री भरतेश गुरुकुल, बेल्लद बागेवाडी (जि. कोल्हापुर) १९५९
४) श्री जिनसेनाचार्य गुरुकुल, तेरदाल (जि. कोल्हापुर) १९६६

अ) महाराष्ट्र प्रांत की प्रशालाएँ

प्राथमिक विभाग

१) इंदुमती शिखरे शिशु विद्यामंदिर, जयसिंगपुर १९८७
२) पुरंदर नाभिराज देमापुरे प्राथमिक विद्यामंदिर, जयसिंगपुर १९९१
३) बालविकास व प्राथमिक विद्यामंदिर, बाहुबली २००२
४) सोनाबाई खोलकुंबे शिशुविकास मंदिर, जयसिंगपुर २००४
५) कमल होसकल्ले बालविकासमंदिर, अकिवाट २००३
६) ध. बा. चौगुले प्राथमिक विद्यामंदिर, अकिवाट ला २००५
७) बालविकास व प्राथमिक विद्यामंदिर, तारदाल २०१३
८) बालविकास व प्राथमिक वि.मं. (अंग्रेजी मा.), जयसिंगपुर २०१३

माध्यमिक विभाग
१) एम. जी. शहा विद्यामंदिर, बाहुबली १९३४
२) विद्यासागर हायस्कूल, अकिवाट मा १९६४
३) सन्मति विद्यालय, तारदाल १९७२
४) जनतारा कल्पवृक्ष विद्यामंदिर, जयसिंगपुर १९७३
५) रत्नसागर हायस्कूल, निमशिरगांव १९८५
६) सरस्वती हायस्कूल, टाकळीवाडी १९८५
७) दादा नाना भोकरे हायस्कूल, कवठेसार १९९१

उच्च माध्यमिक विभाग।
१) ज्युनिअर कॉलेज, बाहुबली १९९१
२) व्यवसाय शिक्षण व प्रशिक्षण, बाहुबली १९९३
३) आक्काताई नरसाप्पा नांद्रेकर ज्यु. कॉलेज, जयसिंगपुर । २००४

ब) कर्नाटक प्रांत की प्रशालाएँ
प्राथमिक विभाग

१) पार्श्वनाथ गुरुकुल प्राथमिक विद्यामंदिर, स्तवनिधी १९३९
२) भरतेश प्राथमिक विद्यामंदिर, बेल्लद बागेवाडी १९५९
३) जिनसेनाचार्य प्राथमिक विद्यामंदिर, तेरदाळ १९६६
४) पी.एस.गुंडवाडे पूर्व प्राथमिक विद्यामंदिर, तेरदाल १९८८
५) बालविकास मंदिर, स्तवनिधी २००५
६) भरतेश शिशु विकासमंदिर, बेल्लद बागेवाडी २००८

माध्यमिक विभाग
१) एस. एम. हायस्कूल, तेरदाल १९५३
२) भरतेश माध्यमिक विद्यामंडळ, बेल्लद बागेवाडी १९५९
३) ए. एस. पाटील हायस्कूल, स्तवनिधी १९७५
४) सन्मति विद्यालय, सिदनाल १९८२
५) पार्श्वमति कन्या विद्यामंदिर, अक्कोल १९८५
६) जिनसेनाचार्य गर्ल्स हायस्कूल, तेरदाल १९९१

उच्च माध्यमिक विभाग
१) भरतेश ज्युनिअर कॉलेज, बेल्लद बागेवाडी १९८४
२) जिनसेनाचार्य विद्यामंडळ ज्युनिअर कॉलेज, तेरदाल २००८

महाविद्यालयीन विभाग
१) ग्रामीण आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज, तेरदाल १९९७
२) भरतेश बी.एड. कॉलेज, बेल्लद बागेवाडी २००४
३) जिनसेनाचार्य पॉलिटेक्निक कॉलेज, तेरदालामा २००८
४) बी. टी. पाटील ॲन्ड सन्स पॉलिटेक्निक कॉलेज, स्तवनिधी २००९

__ इन सभी संस्थाओं का कार्यसंगठन प. पू. गुरुदेवश्री के मार्गदर्शक ‘गुरुकुल पंचसूत्री’ तत्त्वानुसार सुचारु रूप से चल रहा है । सभी गुरुकुल संस्थाओं में प्राय: १५०० से अधिक छात्र गरीब परिवार से आते हैं, जिनके भोजनादि व्यवस्था के लिए उन उन संस्थाओं को इस बढ़ती महंगाई में काफी खर्चा वहन करना पडता है । आप विद्यार्थियोंके एक वक्त के भोजन के लिए आहारदान योजना में १० से १५ हजार रुपयोंकी दानराशि दे सकते हैं । या हरसाल (जिसके ब्याजसे) आजीवन भोजन के लिए २ लाख रुपयोंकी दानराशि दे सकते हैं । आप शिष्यवृत्ती निधि में शक्त्यनुसार दान दे सकते हैं या विद्यार्थी गोद योजना में १ विद्यार्थी का वार्षिक खर्चा रु. २० हजार दे सकते हैं । इसके अलावा उक्त प्रत्येक संस्था के स्थानीय ध्रुवकोष में रु.११,१११ या उससे अधिक दानराशि दे सकते हैं । इस सभी दानपर संस्था को आयकर मुक्ती (८० जी) प्रमाणपत्र प्राप्त है । स्वीकृत दान राशि का चेक ‘श्री बाहुबली विद्यापीठ, बाहुबली’ इस नामसे भेज सकते हैं। बैंक तपशील

श्री बाहुबली ब्रह्मचर्याश्रम S.B.A/C 638801700002

श्री बाहुबली विद्यापीठS.B.A/c 638801700001

आज श्री बाहुबली ब्रह्मचर्याश्रम’ इस संस्था को ८० वर्ष पूरे हो चुके हैं । तथा ‘श्री बाहुबली विद्यापीठ’ यह संस्था अपना सुवर्णमहोत्सवी वर्ष
आयोजित कर रहा है । साथ ही भगवान श्री १००८ बाहुबली की बृहन्मूर्ति को पचास वर्ष पूरे हो चुके हैं। इसके उपलक्ष्य में दि. ३० जानेवारी २०१५ से दि. ५ फरवरी २०१५ तक सुवर्णमहोत्सवी महामस्तकाभिषेक का आयोजन उल्हासपूर्वक किया जायेगा । जो महानुभाव विविध कार्यहेतु दान देना चाहते हैं, वह उपर्युक्त बैंक खाते में ऑनलाईन राशी जमा करके उसकी काऊंटर स्लिप | मेल किजिए ताकी रसीद भेजनेमें सुविधा होगी।
आपके सहयोग से जिनधर्म की सातिशय प्रभावना एवं शिक्षा का प्रसार अवश्य होगा। अतः साधर्मी बंधुओं से सहाय्यता की अपेक्षा है।